भारत-चीन सीमा विवाद: ITBP के हिमवीरों के आगे कोई नहीं टिक सकता, LAC पर ऐसी है तैयारी

पिछले साल भारत-तिब्बत सीमा पुलिस फोर्स यानी आईटीबीपी के एक फ्रंटियर को चंडीगढ़ से हटाकर लेह लाने का फैसला अब अपने फायदे दे रहा है. भारत और चीन के बीच पिछले चार महीने से चल रहे तनाव में सेना के साथ आईटीबीपी के हिमवीर भी सबसे आगे खड़े हैं. आईटीबीपी का हर जवान माउंटेनियरिंग का जानकार होता है इसलिए उनके लिए इन ऊंचे इलाकों में काम करना आसान होता है.

अप्रैल 2019 में आईटीबीपी के नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर के मुख्यालय को लेह लाया गया था. इस फ्रंटियर में लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और चंडीगढ़ में तीन सेक्टर हैं जोकि सेना की एक ब्रिगेड के बराबर होते हैं. इस फ्रंटियर की सभी 12 बटालियनें इस समय लद्दाख के फॉरवर्ड लोकेशन पर हैं. पहले लेह में केवल एक सेक्टर होता था जिसमें तीन बटालियन ही होती थीं. आईटीबीपी का गठन 1962 में चीन हमले के दौरान ही एक माउंटेनियरिंग फोर्स के रूप में हुआ था.

भारत और चीन के बीच 4000 किमी की एलएसी की सुरक्षा की जिम्मेदारी आईटीबीपी संभालती है. इसलिए इस फोर्स के जवान माउंटेनियरिंग के माहिर होने के साथ-साथ ऊंचे पहाड़ों के मौसम के भी आदी होते हैं. ट्रेनिंग के अलावा अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से आईटीबीपी इस समय लद्दाख के हर मोर्चे पर कामयाबी के साथ डटी हुई है.

फ्रंटियर के जवानों को आने वाली भीषण ठंड से निबटने के लिए आर्कटिक टेंट, केरोहीटर और बुखारी दे दी गई है जिससे सैनिक सर्दी में भी आराम से रह सकें. सैनिकों को तीन लेयर में पहनने वाले वही कपड़े दिए गए हैं जिनका इस्तेमाल सियाचिन में तैनात सैनिक करते हैं. खास जूते और स्नो गॉगल्स सैनिकों को फ्रास्ट बाइट से बचाते हैं.

आईटीबीपी के जवान पहाड़ों में बचाव कार्य में भी माहिर हैं और वही पूरे हिमालय में किसी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा के दौरान सबसे पहले बचाव और राहत कार्य के लिए पहुंचते हैं. यहां आईटीबीपी के पास एक खास मशीन है जिसके जरिए 60 फीट तक 250 किग्रा तक के वजन को बिना मेहनत से खींचा जा सकता है. कुल 20 किलो वजन की ये मशीन बैटरी से चलती है और रस्सी के सहारे घायल या बीमार सैनिक को स्ट्रेचर समेत सुरक्षित जगह पर पहुंचा सकती है.