कश्मीर सीरीज पार्ट-5: कश्मीरी बच्चों के रोल मॉडल बन रहे आतंकी

स्कूल में पढ़ने वाला लड़का आरिफ अली जब दक्षिणी कश्मीर स्थित अपने पुश्तैनी गांव- रेडवानी के बाजार से गुजरता है, तो उसकी जुराब में खिलौने वाली पिस्तौल मौजूद होती है. वह एक आतंकवादी के अंदाज में अपने कंधे को देखता है और सड़क के किनारे मौजूद सेना की गाड़ी पर भी नजर दौड़ाता है. उसके लिए यह सहज स्थिति का संकेत नहीं है, लिहाजा जब तक वह छोटी गली के किनारे नहीं पहुंच जाता है, तब तक उसकी नजर नीची रहती है. इस छोटी गली का रास्ता उसके स्कूल तक जाता है.

यह स्कूल छोटा और दोमंजिला इमारत में मौजूद है. अली के पहुंचने के बाद बाहर इंतजार कर रहे उसके सभी दोस्त हंसने लगते हैं. सेना की गाड़ी आंखों से ओझल होने के साथ ही वह राहत की सांस लेता है. आरिफ के साथ चलना हथियारों से लैस आतंकवादी के साथ चलने जैसा है. अंतर सर्फ इतना है कि आरिफ का पिस्तौल लकड़ी का बना है और उसके कंधे पर लटका बैग गोला-बारूद नहीं बल्कि किताबों से भरा है.

छठी कक्षा में पढ़ने वाला आरिफ का दोस्त जमीर मुट्ठी बांधते हुए कहता है, ‘हमारा मुजाहिद आज जिंदा है.’ इसके बाद आरिफ का जवाब कुछ इस तरह होता है, ‘पहले की तरह मैं आज भी बिना चेकिंग के आने में कामयाब रहा.’ लकड़ी का पिस्तौल रखना और शिक्षकों या सुरक्षों बलों द्वारा नहीं पकड़ा जाना आजकल दक्षिणी कश्मीर के स्कूली बच्चों के बीच लोकप्रिय खेल बन चुका है. हाल के दिनों में एक सुबह आरिफ कुछ ऐसा ही कर रहा था और कुलगाम के कैमोह इलाके में बच्चों का शोर भी इसी तरह से गूंज रहा था.

बहरहाल, जम्मू-कश्मीर में इस साल रिकॉर्ड हिंसा देखने को मिली, लेकिन कश्मीर घाटी के बच्चों पर इसके होने वाले असर के बारे में काफी कम चर्चा की जाती है. दरअसल, उन्हें भी इस हिंसा के प्रकोप का सामना करना पड़ा है और उनकी रोजाना की जिंदगी इससे काफी हद तक प्रभावित हुई है. पिछली सदी के अंत के आसपास पैदा हुए जम्मू-कश्मीर के ये बच्चे राजनीतिक रूप से भी बेहद कट्टरपंथी जैसे हैं. हालात ऐसा हो गए हैं कि युद्ध और एनकाउंटर के शब्दकोष इन बच्चों की जिंदगी में छा गए हैं.

बच्चों के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है कश्मीर का संघर्ष

कश्मीर में चल रहा रोज-ब-रोज का संघर्ष राज्य में रह रहे बच्चों की जिंदगी किस तरह से प्रभावित कर रहा है, यह देखने के लिए हाल ही में एक दिन सुबह को मैंने आरिफ के घर से ही उसकी गतिविधियों पर गौर करना शुरू किया. इस स्कूली बच्च से अगले 6 घंटे की हर बातचीत में मुजाहिद (आतंकवादी), मुखबिर, बंदूक, कब्र, छिपने का ठिकाना, जनाजा और इसी तरह के अन्य शब्दों की भरमार थी.