‘जम्मू कश्मीर भू-राजनीति की दृष्टि से भारत के लिए महत्वपूर्ण अंग’

 केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के कुलपति कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने बुधवार को सम्राट ललितादित्य व्याख्यान माला में जम्मू-कश्मीर के भू-राजनीति विषय पर चर्चा का आयोजन किया गया। इस दौरान कुलपति ने कहा कि कश्मीर क्षेत्रफल के लिहाज से नहीं बल्कि अपने भू-राजनीति परिदृश्य के कारण काफी महत्व रखती है।
उन्होंने कहा कि हिमाचल की चोटियों पर जब चीन का कब्जा हुआ तो भारत के लिए इस इलाके की सुरक्षा का खतरा उत्पन्न हुआ। तत्कालीन भारत सरकार द्वारा इस इलाके को गंभीरता से न लेने के कारण भारत 1962 का युद्ध चीन के हाथों हार गया था। अग्निहोत्री ने कहा कि भारत में जितने भी हमले हुए वह सभी नोर्थवेस्ट प्रांत से हुए, 1962 के बाद चीन भारत के कब्जा किए हुए इलाके में काफी मूलभूत सुविधाएं विकसीत कर ली थी, लेकिन भारत कि सरकार ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस सरकार ने भू- राजनीति की परिदृश्य को समक्षा और मूलभूत सुविधाएं विकसित कर रहे है।
उन्होंने कहा कि गुलामी के दौर में सिर्फ महाराजा रणजीत सिंह ने ही इस भू-राजनीति को समक्षा व खैबड़ तक अपना साम्राज्य फैलाया। उन्होंने सभागार को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान का बनना धार्मिक कारण नहीं ब्लकि भारत को भू-राजनीति में कमजोर करने के लिए बनाया गया। अंग्रेज जब भारत के सांस्कृतिक विरासत को तौड़ने में नाकाम रहे तो उन्होंने पाकिस्तान बनाकर इसका बदला लिया। तत्कालीन भारत सरकार के इच्छाशक्ति के कमी के कारण ही गिलगित बालटीस्तान आज भारत का हिस्सा नहीं है। शेख अबदुल्ला के 1846 की संधि को रद्द करने के लिए चलाए गए आंदोलन में पंडित नेहरू ने भी मदद की। पाकिस्तान कश्मीर को कितना हड़पे वो पहले से निर्धारित था।