उच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर में ‘‘दरबार स्थानांतरण’’ की जरूरत पर विचार करने को कहा

जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने केन्द्र सहित नीति निर्माताओं से केंद्र शासित प्रदेश में 148 साल से जारी वर्ष में दो बार ‘‘दरबार स्थानांतरण’’ की जरूरत पर इस तथ्य को ध्यान में रखते गौर करते हुए विचार करने को कहा कि इस पूरी प्रक्रिया से वित्तीय परेशानी से जूझ रहे जम्मू-कश्मीर पर 200 करोड़ रुपये से अधिक का बोझ पड़ता है। मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने 93 पन्नों के फैसले में वरिष्ठ अधिवक्ता मोनिका कोहली की सलाह को भी सूचीबद्ध किया है जिन्होंने आधिकारिक दस्तावेजों को डिजिटल स्वरूप देने की जरूरत को रेखांकित किया है। मामले पर स्वत: संज्ञान लेकर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने साल में दो बार दरबार के स्थानांतरण का ऐतिहासिक संदर्भ दिया जिसमें राजधानी को हर छह महीने में जम्मू और कश्मीर में परस्पर स्थानांतरित किया जाता है। जम्मू शीतकालीन राजधानी होती है जबकि श्रीनगर ग्रीष्म कालीन राजधानी होती है। अदालत ने कहा कि दरबार स्थानांतरण का मूल और क्रियान्वय जनहित की अवहेलना करता है। इसका प्रतिकूल प्रभाव, विशाल राजकोषीय, सामाजिक और आर्थिक लागतों से संबंधित तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है। अदालत ने कहा, ‘‘जो तथ्य पेश किए गए उससे लगता है कि प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक उपलब्धि के चलते बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप बदलाव नहीं किया गया। हमारा न्यायिक विवेक हमें सतर्क करने के लिए विवश करता है अन्यथा हम अपने न्यायिक कर्तव्य या संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन करने में विफल हो जाएंगे पाएंगे जो राष्ट्र और जम्मू-कश्मीर खासतौर पर आम महिलाओं और पुरुषों, गरीबों के प्रति है।’’ अदालत ने कहा, ‘‘हम अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के प्रति सजग हैं, इसलिए खुद को बिना कुछ कहे ‘‘ घंटी बजाने’’ तक सीमित रखेंगे।’’