जितेंद्र सिंह बोले, ‘शेख अब्दुल्ला ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 44 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा’

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला ने जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 1953 में 44 दिनों तक अपने राज्य की एक जेल में अवैध रूप से कैद कर रखा था. मुखर्जी की पुण्यतिथि मनाने के लिए दिल्ली में एक वार्ता में भाजपा सांसद ने उन घटनाओं का सिलसिलेवार वर्णन किया जो अंतत: मुखर्जी को कथित तौर पर अवैध हिरासत में रखे जाने पर समाप्त हुईं. उन्होंने कहा कि तत्कालीन सांसद मुखर्जी ने राज्य का दौरा करने की अपनी इच्छा के बारे में सूचित करने के लिए शेख अब्दुल्ला को टेलीग्राम भेजा था.

सिंह ने कहा कि मुखर्जी की एकमात्र गलती यह थी कि वह उचित अनुमति के बिना जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने का प्रयास कर रहे थे. नियम के अनुसार उन्हें वापस पंजाब भेज दिया जाना चाहिए था जहां से उन्होंने यात्रा शुरू की थी या उन्हें जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश करने से रोक देना चाहिए था. उन्होंने कहा लेकिन शेख सरकार ने इसके उलट जल्दबाजी में इस तरह की कार्रवाई की जैसे कि वह मुखर्जी को गिरफ्तार करने और जेल की सलाखों के पीछे डालने का इंतजार कर रहे थे.

इस बीच राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव एमके किदवई ने लोकसभा अध्यक्ष को टेलीग्राम एवं पत्र भेजकर सूचित किया कि मुखर्जी को लोक सुरक्षा कानून की धारा तीन के तहत गिरफ्तार कर लिया गया है. सिंह ने कहा कि चूंकि मुखर्जी दक्षिण कोलकाता सीट से लोकसभा सदस्य थे, शेख सरकार ने स्पष्ट रूप से उनकी गिरफ्तारी के बारे में अध्यक्ष को सूचना देने की परंपरा का पालन किया लेकिन उनकी गिरफ्तारी के वक्त किसी दस्तूर या प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ और न ही उन पर लगे आरोपों को लेकर सही तरीके से मुकदमा चला.

उन्होंने दावा किया कि मुखर्जी को निर्ममता से श्रीनगर जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया जैसे कि वह कोई अपराधी हों और जेल में 44 दिन रहने के दौरान राज्य सरकार के एक भी प्रतिनिधि ने उनसे मिनले या उनके बारे में जानने का शिष्टाचार नहीं दिखाया. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री सिंह ने कहा कि इतना ही नहीं 24 मई 1953 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री केएन काटजू, शेख अब्दुल्ला के मेहमान बन कर श्रीनगर पहुंचे लेकिन तीनों में से किसी ने कुछ ही दूरी पर जेल में बंद मुखर्जी के बारे में जानने की जहमत नहीं उठाई.

उन्होंने कहा कि यहां तक कि जब मुखर्जी ने 23 जून, 1953 को सुबह तीन बजकर 40 मिनट पर रहस्यमयी परिस्थितियों में अंतिम सांस ली, उनके निधन की खबर को कई घंटों तक रोक कर रखा गया. साथ ही उन्होंने कहा कि आकाशवाणी पर इसका प्रसारण दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर किया गया. सिंह ने कहा कि यह संसदीय कार्यवाही के रिकॉर्ड में दर्ज है जब सांसद एसपी गिडवानी ने तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री वीके केसकर के सामने यह प्रश्न रखा लेकिन मंत्री के पास इसका कोई उत्तर नहीं था.

उन्होंने कहा कि जब मुखर्जी के पार्थिव शरीर को औपचारिक सम्मान या शिष्टाचार के बिना श्रीनगर से लाया गया था तब शेख अब्दुल्ला की अध्यक्षता वाली राज्य सरकार ने इंडियन एयरलाइन्स का 7,548 रुपये का किराया तक चुकाने से भी इनकार कर दिया था. सिंह ने याद किया कि जब 24 जून को उनका शव कोलकाता पहुंचा लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा और यह नारा लगाया, “जहर दिया, किसने दिया? शेख ने दिया शेख ने दिया” शेख से मतलब था शेख अब्दुल्ला. उन्होंने कहा कि इसमें कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है कि मुखर्जी की रहस्यमयी मौत के पीछे के कारणों को जानने के लिए ठीक ढंग से जांच नहीं हुई जबकि सभी धड़ों से इसके लिए बार-बार आग्रह किया गया था.