जम्मू-कश्मीर पर अब मंडरा रहा है एक नए किस्म का खतरा

जम्मू-कश्मीर में एक नए किस्म का खतरा ( New threat over J&K ) मंडरा रहा है। इस खतरे से निपटने में सुरक्षा बल भी कुछ नहीं कर सकते। यह खतरा है हिमालय की तरफ से। इस खतरे का कारण है प्रकृति से छेड़छाड़ और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुन्ध दोहन। हिमालय के ग्लेशियर पिघलने ( Threat of Enviorment change ) से जम्मू-कश्मीर पर पर्यावरणीय संकट मंडरा रहा है। एक नए शोध से पता चला है कि हिमालय के ग्लेशियर पिछले 60 वर्षों में 23 प्रतिशत क्षेत्र खो चुके हैं। यह अध्ययन कश्मीर विश्वविद्यालय के पृथ्वी विज्ञान विभाग के आसिफ मरज़ी और शकील रोमशू द्वारा किया गया।

सबसे बड़ा ग्लेशियर कोलाही
अध्ययन का उद्देश्य सिकुड़ते ग्लेशियरों से बहने वाली धारा के प्रभाव तक पहुंच बनाना था और अध्ययन के लिए 37 प्रमुख ग्लेशियरों का चयन किया गया था। कश्मीर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में लिद्दर घाटी में कई ग्लेशियर हैं, जिनमें सबसे बड़ा ग्लेशियर कोलाही है।

23 प्रतिशत ग्लेशियार पिघल चुके
अध्ययन में कहा गया है कि घाटी के ग्लेशियर पिछले 60 वर्षों में 23 प्रतिशत क्षेत्र और 22 प्रतिशत ग्लेशियल द्रव्यमान खो चुके हैं। शोध में कहा गया है कि ग्लेशियरों की कमी के कारण नदियों के धारा प्रवाह में महत्वपूर्ण कमी आई है। क्षेत्र में ग्लेशियरों का सिकुडऩा बढ़ते तापमान और सर्दियों के दौरान इस क्षेत्र में वर्षा के रूप में परिवर्तन के कारण है।

गर्मियों में प्रवाह में कमी
ग्लेशियरों से धारा प्रवाह जून और जुलाई के चरम गर्मियों के महीनों में एक समग्र घटती प्रवृत्ति को दशार्ता है। पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर शकील रोशशू ने वर्षा को एक महत्वपूर्ण जलवायु पैरामीटर के रूप में कहा है जो लिद्दर घाटी में एक ग्लेशियर के समग्र तौर पर को नियंत्रित करता है।

तापमान बढऩे से संकट
विश्वव्यापी तापमान के बढऩे से पिघल रहे ग्लेशियरों के कारण जम्मू-कश्मीर में पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की आवक पर असर पड़ा है। यहां बहने वाले नदियों के प्रवाह में विगत वर्षों में तुलनात्मक कमी देखी गई है। पर्यावरणीय असंतुलन के कारण लगातार हिमपात, भूस्खलन, और बेमौसम बारिश से बागानी और कृषि की पैदावार पर असर पड़ा है।