जम्मू-कश्मीर: मधुमक्खी पालन से जुड़े 4 लाख के करीब लोगों की रोजी रोटी पर संकट

कोरोना वायरस के चलते जम्मू-कश्मीर में मधुमक्खी पालन से जुड़े करीब 4 लाख लोगों की रोजी रोटी पर संकट है. ना तो बना शहद बिक रहा है और ना ही नए शहद को बनाने के लिए फूलों वाले इलाकों में माइग्रेशन मुमकिन हो रहा है. कोरोना वायरस के प्रकोप के बाद लगातार लॉकडाउन के कारण जम्मू-कश्मीर की मधुमक्खी पालन की पुरानी परंपरा वाला कारोबार एक बड़ी समस्या का सामना कर रहा है. कई मधुमक्खी पालक अपने उत्पादों (शहद) को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने में असमर्थ हैं.  

श्रीनगर में मधुमक्खी पालन करने वाले बिलाल अहमद कहते हैं, “हम जो माइग्रेशन करते हैं, उसमें कॉफी मुश्किलें आ रही हैं. हमारे व्यवसाय पर बहुत असर पड़ा है. अगर ऐसे ही हालत रहे तो हम माइग्रेशन की सोच भी नहीं सकते. सर्दियों में शहद की माखी यहां नहीं रह सकती, इसे गर्मी चाहिए.” 

जम्मू और कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेश में वातावरण मधुमक्खी पालन के लिए अनुकूल माना जाता हैं, लेकिन कोनोना वायरस शहद के उत्पादन के लिए एक बड़ी चुनौती है. घाटी ने पिछले साल 350 टन शहद का उत्पादन किया गया था जिसमें कई शिक्षित युवाओं ने अपना कारोबार शुरू किया था. 

बिलाल अहमद ने कहा “इस कारोबार के साथ एक लाख से ज्यादा युवा जुड़े हैं और उनके साथ मजदूर भी हैं जो तीन लाख से ऊपर है. यहां शहद का उत्पादन ढाई सौ मैट्रिक टन के करीब होता है.” 

व्यापारियों को यह भी डर है कि कोविड-19 के कारण, लोग अपनी मधुमक्खियों के साथ पलायन ना करने पर नुकसान तो झेलेंगे ही, साथ ही लॉकडाउन के कारण जो शहद उनके पास है, व्ह भी नहीं बेच पाएंगे. घाटी के सभी दस जिलों का शहद उत्पादन में योगदान रहता है.