कश्मीर में ठंड से लड़ने के लिए आज भी काम आती हैं ये 3 पारंपरिक चीजें

हाड़ कंपा देने वाली ठंड से लड़ने के लिए कितने भी आधुनिक तरीके इंसान ने इजाद किए हो. मगर कश्मीर में आज भी परम्परिक तरीकों से ही ठंड की कठोरता को मात दी जाती है. कश्मीर में ठंड आते ही यहां की तीन पारंपरिक चीज़ों (फेरन, कांगड़ी और पकवान हरीसा) को हर कश्मीरी अपनाना शुरू कर देता है. आपको बताते हैं इन तीनों चीजों की खासियत.

कश्मीर में ठंड से लड़ने के लिए तीन पारंपरिक तरीके जो हजारों सालों से कश्मीर की संस्कृति का हिस्सा बने हुए है और आज 21वीं सदी में भी अपनी पहचान नहीं खोए है. यह तीनों चीजें आज भी कश्मीर का हर घर में मिलती है.
फेरन और हरीसा यह दोनों तो मिडल ईस्ट से हज़ारों साल पहले जब कश्मीर में इस्लाम क़ायम हुआ था तब ही कश्मीरियों ने इन चीज़ों को अपनाया था.

फेरन को फ़ारसी ज़ुबान में पेहराहन कहा जाता था कंंधों से लेकर एड़ियों तक लंबा यह पहनावा धीरे धीरे फेरन बन गया. यह कश्मीर की संस्कृति का वो हिस्सा है जो आज हज़ारों साल बाद भी कश्मीरियों में एक बड़ा मुकाम रखता है. कश्मीर के इतिहासकार मानते है कि वक्त कितना भी विकसित क्यों ना हो, यह पहनावा कश्मीर के लोग कभी नहीं बदलेंगे.

कश्मीर इतिहासकार और लेखक ज़रीफ़ अहमद ज़रीफ़ कहते है ” फेरन का जो मामला है जब हमने इस्लाम कबूल किया तो सेंट्रल एशियन का प्रभाव रहा. हम इसे कहते थे पेहराहन. उसी पेहराहन को हमने फेरन के नाम से कबूल किया”.

फेरन एक लंबा गाउन जो मोटे वूल कपडे का बनता है और सरद हवाओं से इंसान को बचता है. यह मेडिकली भी लाभदायक है. दरसल इस गाऊन में जब इंसान रहता है तो इसके अंदर रहने वाली हवा गरम रहती है और यह बदन को ठंडी हवाओं की कपन से बचता है. यह पहनावा जो खरीदने में भी बाकि गरम पहनावों से सस्ता है अब इसकी बनावट में बदलाव लाकर इस घर के इलावा लोग स्कूल कॉलेज और दफ्तरों में भी इस्तेमाल करने लगे है. लेकिन फेरन तब तक अधूरा दिखता है जब तक ना इसके भीतर कांगड़ी ना हो.

कांगड़ी जिसे कश्मीरी आजकल मोबाइल हीटर भी कहते है. कांगड़ी की बनावट की अगर बात करें तो यह मिट्टी के एक गोल बर्तन पर पेड़ों की लचीली टहनियों से एक बास्केट की तरह बनाई जाती है, फिर इस मिट्टी के बर्तन में कोयला डाल आग पैदा की जाती है. इसके बाद कांगड़ी को फेरन के भीतर लेकर इसे बदन को गरम रखा जाता है. कांगड़ी को पहले मानन (मिट्टी का बर्तन) के नाम से जाना जाता था फिर इसे कंग (आग) का नाम दिया गया मगर अब यह कांगड़ी के नाम से कश्मीर में मशहूर है. कांगड़ी की बनावट भी अलग अलग तरीकों से होती है. एक कांगड़ी नाज़ुक पतली टहनिओं से बनती है जिसे शादी या किस और समारोह पर इस्तेमाल किया जाता है और यही कांगड़ी जब मज़बूत टहनियों से बनती है तो इसे आम मेहनतकश लोग इस्तेमाल करते है.

कांगड़ी में सुबह आग डाली गई तो शाम तक इंसान इसे अपने साथ लेकर खुद को गरम रख सकता है ना बिजली जाने का डर ना गैस खत्म होने की चिंता. लेकिन डॉक्टर कांगड़ी के इस्तेमाल के दौरान कुछ एहतियात करने की सलाह भी देते है. कांगड़ी में जो कोयला पड़ता है उसे धूंआ वा नहीं होना चाहिए और कांगड़ी को ऐसे इस्तेमाल करना की उसका ताप टांगों और पेट को ज़ियादा ना लगे जिसे कैंसर होने का खतरा रहता है.

डॉक्टर नवीद शाह कहते है ” अगर हम कश्मीर की बात करे यहाँ बोहत मुश्किलें होती है बिजली नहीं होती गैस की किलत होती है पारम्परिक तोर हम जो इस्तेमाल करते है कांगड़ी यह हमें गर्म रखती है अगर हम सुबह कांगड़ी ले तो शाम तक हमें गरम रखती है”.

अब बात हरीसा की करते हैं. हरीसा पूरी रात तैयार होता है, ज़मीन के अंदर गड़े एक मिट्टी के बर्तन के इर्द गिर्द आग जलाई जाती है फिर इस मिट्टी के बर्तन में सूखे चावल, बकरे के गोश्त के साथ बहुत सारे मसाले डाले जाते है. रातभर इसे पकाया जाता है फिर सुबह रोशनी होते ही लोग हरीसा की दुकानों पर पहुंचते है और इसे खाते है. पहले तो यह पकवान कश्मीर की कुछ ही दुकानों पर बनता था. मगर अब हर जगह मिलता है, यहाँ तक की अब लोगों ने इसे घर में भी बनाना शुरू किया है और इतना ही नहीं यह पकवान अब देश के बाकि हिस्सों के साथ साथ विदेशों में भी भेजा जाता है.

सेहत के लिए भी इसे बेहद अच्छा माना जाता है यह पकवान हाई प्रोटॉनिक और फेटी होता है और इसमें पड़ने वाले मसलों के कारण यह पकवान पूरे जिस्म के अंदर कड़ाके की ठंड में भी हरारत दिनभर बनाये रखता है.

डॉक्टर नवीद शाह कहते है ” हरीसा जो हम कहते है जिसमें चावल गोश्त पड़ता है और बोहत सारे मसाले और तेल भी पड़ता है इस में हाई प्रोटीन होते है जो हमें ठंड से बचने के लिए मदद करता है. मगर कुछ लोगों को जिन्हे दिल की बीमारी हो परहेज़ करना चाहिए. लेकिन नार्मल इंसान को यह सर्दियों से बचने के लिए काफी मदद कर सकता है”.

आम कश्मीरी भी मानते है कि यह तीन चीज़े कश्मीर की पहचान है और सर्दियों में हर कश्मीरी इसे इस्तेमाल करता आया है और करता रहेगा. आज भी अगर कश्मीरी में सर्दियों के मौसम में नज़र दौड़ाए तो हर दूसरा इंसान क्या पुरुष और क्या महिला और क्या बचे फेरन और कांगड़ी लेकर दिखेंगे.