कश्मीरी अलगाववादियों के सामने अब कैसी होगी आगे की राह

जम्मू-कश्मीर में नये अध्याय की शुरुआत के बरक्स एक बड़ा सवाल यह है कि कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की अब क्या रणनीति होने वाली है? क्या ये नेता मुख्यधारा की राजनीति में शामिल होंगे, या फिर भारत सरकार के साथ इनका पुराना रवैया जारी रहेगा. अगर विकल्पों की बात करें तो इन कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के सामने दो-तीन विकल्प बचते हैं. ये नेता कथित आजादी की मांग को त्याग कर मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हों और चुनाव में उतरें, पहले की तरह भारत सरकार का विरोध करते रहें और आजादी की मांग पर कायम रहें, या फिर आतंकवादियों की तरह सशस्त्र संघर्ष की घोषणा कर दें.
बता दें कि इस वक्त केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के प्रमुख अलगाववादी नेताओं पर कानूनी शिकंजा कस दिया है. जेकेएलएफ चेयरमैन यासीन मलिक इस वक्त कई मुकदमों के सिलसिले में तिहाड़ जेल में बंद हैं. महिला अलगवादवादी संगठन दख्तरिन-ए-मिल्लत की चीफ आसिया अंद्राबी, ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के जनरल सेक्रेट्री मशरत आलम और शब्बीर शाह भी तिहाड़ जेल में बंद हैं. इन नेताओं पर मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है. इन अलगावादियों के खिलाफ सरकार किसी तरह के नरमी के मूड में नहीं दिख रही है.

मुख्यधारा की और लौटेंगे अलगाववादी?

पिछले कुछ दिनों में आई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक खुफिया एजेंसियों ने इस ओर इशारा किया है कि अलगवादवादी खेमे के कई नेता अब जिद छोड़कर सरकार के साथ चलने का मन बना रहे हैं. इन नेताओं को आगाह हो गया है कि भारत विरोध की उनकी रणनीति ज्यादा दिनों तक कारगर नहीं होने वाली है. हुर्रियत सूत्रों से छन-छनकर आने वाली रिपोर्ट पर गौर करें तो पता चलता है कि हुर्रियत नेताओं की युवा पीढ़ी अब मुख्यधारा की राजनीति में शामिल होना चाहती है.

कौन भरेगा PDP और नेशनल कॉन्फ्रेंस की जगह?

जम्मू-कश्मीर में इस वक्त स्थानीय राजनीतिक दल हाशिए पर हैं. जब यहां से अनुच्छेद 370 को हटाया गया तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था. इस वजह से इस फैसले को राज्य की संविधान सभा से पास कराने की मजबूरी भी नहीं थी. इस फैसले के बाद से पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बड़े नेता नजरबंद हैं या हाउस अरेस्ट की स्थिति में हैं. केंद्र सरकार के रवैये के विरोध में वहां हो रहे चुनावों का भी प्रमुख स्थानीय राजनीतिक दलों ने बहिष्कार किया है. हालांकि अब राज्य में कई सख्तियों में ढील दी जा रही है. कश्मीर में एक बार राजनीतिक प्रक्रिया शुरू होते ही यहां उपजे पॉलिटिकल वैक्यूम को भरने के लिए नये चेहरों की जरूरत होगी. अलगाववादियों की युवा पीढ़ी के पास इस खाली स्थान को भरने का विकल्प है. ऐसा इसलिए क्योंकि इन नेताओं के भारत विरोध का कोई अतीत नहीं है.

कश्मीर में पूर्वोत्तर का फंडा

भारत सरकार के पास एक विकल्प यह भी है कि वो इन अलगाववादियों को खुद ही मुख्यधारा में शामिल कराए. यहां पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठनों का जिक्र करना जरूरी है. मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार नगालैंड में कई अलगाववादी संगठनों के नेताओं को मुख्यधारा में शामिल करा चुकी है. इसके लिए सबसे पहली शर्त है कि ये अलगाववादी नेता पाकिस्तान से अपने सारे संपर्कों को खत्म करें, और भारत विरोध की राजनीति को पूरी तरह से छोड़ दें. हालांकि ऐसा उन्हीं अलगाववादियों के साथ किया जाना संभव है जिन पर किसी तरह के गंभीर आरोप नहीं हैं. इस प्रक्रिया को फॉलो करने में केंद्र सरकार को लंबा समय लग सकता है.

विकास बदलेगी तस्वीर, निरर्थक होंगे अलगाववादी

अगर अगले कुछ सालों में जम्मू-कश्मीर में माहौल ठीक रहता है और वहां पर बड़े पैमाने पर निवेश होता है, पर्यटन रफ्तार पकड़ता है तो लाजिमी है कि लोगों की जिंदगी में समृद्धि आएगी, इसका सीधा असर लोगों की सोच पर पड़ेगा. हंसी-खुशी जनता आसानी से अलगाववादियों के बहकावे में नहीं आएगी, ऐसी हालत में अलगाववादी खुद अपना वजूद खो देंगे. बता दें कि पंजाब में सख्त कानून व्यवस्था के दम पर आतंकवाद पर काबू तो पा लिया गया, लेकिन वहां के लोगों की जिंदगी में जब समृद्धि आई तो उन्होंने आतंक का रास्ता खुद-बखुद छोड़ दिया.