कश्मीर में आतंक पर लगे और लगाम

सेना की उत्तरी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह की इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि साल 2018 में जम्मू-कश्मीर घाटी में आतंकरोधी अभियानों के दारान सुरक्षाबलों को उल्लेखनीय सफलता मिली है और तमाम शीर्ष आतंकियों का सफाया किया जा चुका है। पिछले साल मारे गए आतंकियों की संख्या 10 सालों में सबसे ज्यादा है। वर्ष 2018 में 250 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए, 54 को गिरफ्तार किया गया और चार ने आत्मसमर्पण कर दिया। लेकिन लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह की इस बात के साथ इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि घाटी में कट्टरता बढ़ी है। कट्टर विचारधारा के प्रलोभन में आकर युवा, यहां तक कि स्कूल जाने वाले किशोर भी आतंक की राह पकड़ रहे हैं और राज तथा समाज दोनों के लिए खासी परेशानी खड़ी कर रहे हैं। 14 व 17 साल के बच्चों का आतंकवाद के साथ लगाव एक खतरनाक संकेत दे रहा है। इस ‘आतंक’ के इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र तथा इससे जुड़े मनोविज्ञान को समझने तथा उसपर कुशल कारगर रणनीति बनाकर तत्काल काम करने की जरूरत है।

यहां पर एक बात और विशेष रूप से समझने की जरूरत है कि धार्मिक कट्टरता की वजह से पढ़े-लिखे तथा नौकरीपेशा नौजवान भी हाथ में बंदूक थाम रहे हैं और सुरक्षाबलों के लिए चुनौती बन रहे हैं। आतंकवदियों को पनाह देने, उन्हें भागने का रास्ता देने के दौरान या मारे गए आतंकी के जनाजे के समय स्थानीय नागरीक भी जिस तरह पत्थरबाजी कर सैन्यबलों को निशाना बनाते हैं वह भी जिहादी कट्टरता की श्रेणी में आता है। इस बात से सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं कि यह कट्टरता अचानक दो-चार दिनों में नहीं बनती। इसे बनने में सोची-समझी साजिश भरा मनोविज्ञान काम करता है। इसी का नतीजा है कि वर्ष 2017 में जहां घाटी के 131 नव-युवक विभिन्न आतंकी संगठन में शामिल हुए, वहीं 2018 में ऐसे नौजवानों की संख्या बढ़कर 200 से ऊपर हो गई। निश्चय ही यह चिंता का विषय है। इस पर सभी को समग्रता के साथ काम करने की जरूरत है। आखिर क्यों धरती के स्वर्ग में यहां के नौजवान बंदूक थामने में पर अमादा हुए? यह बात पूरा देश और घाटी के बाशिंदों को ही समझनी होगी। यह सही है कि केंद्र व सूबे में राजपाल शासन के दौरान घाटी के युवाओं को बंदूक छोड़ने तथा मुख्यधारा में शामिल करने का काम किया जा रहा है। पर इस तरफ सधे कदमों के साथ और तेजी लानी होगी।

यह सही है कि घाटी का आतंकवाद लंबे समय से एक चुनौती है लेकिन जिस तरह सेना, सुरक्षाबल तथा पुलिस मिलकर संयुक्त अभियान के जरिए सफलता हासिल कर रही है। उसी तरह भीतर और सीमा पार के आतंकवाद की रीढ़ तोड़ने के लिए मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनौतिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए काम करना होगा। साथ ही सेना, सुरक्षाबल व जम्मू-कश्मीर पुलिस के संयुक्त अभियानों की तरह केंद्र, राज्य प्रशासन व स्थानीय नेता राष्ट्रीय रणनीति बनाकर और उस पर ईमानदारी से चलकर कश्मीर के हालात को तेजी से सामान्य बना सकते हैं। लेकिन बात ठोस, कारगर, नीति बनाकर और उस पर चलने से ही बनेगी।

शासन में सुधार, पर्याटन आदि के जरिए सभी वर्ग के लोगों को रोजगार, नकारात्मक व मजहब के नाम पर कट्टरता फैलाने वाले नेताओं का बाहिष्कार आदि से हालात तेजी से सामान्य होने की ओर बढ़ सकते हैं। सख्ती, नरमी, तेजी आदि का सहारा लेकर घाटी की इन चुनौतियों से पार पाया जा सकता है इसमें दो राय नहीं। हालात सामान्य रहे तो आम चुनाव के साथ सूबे के विधानसभा चुनाव भी करवाए जा सकते हैं। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार का कोई सानी नहीं होता।