इस गांव में बचे हैं केवल 8 पुरुष, हर तरफ दिखती हैं विधवाएं

राजस्थान में एक गांव ऐसा है जहां मात्र 8 पुरुष बचे हैं, गांव में बाकी महिलाएं और बच्चे हैं. इस गांव में 40 से 50 घर हैं और आबादी करीब 150 से 200 है. यहां करीब 20 से 25 घर ऐसे हैं जिसमें पुरुष युवावस्था में ही जान गंवा चुके हैं. इस गांव में अब पुरुषों से अधिक विधवाएं है. यह त्रासदी है सिरोही जिले के पिण्डवाडा तहसील अंतर्गत कोजरा ग्राम पंचायत के राणीधरा गांव की. पिण्डवाडा उपखंड क्षेत्र में पिछले 3 वर्षो में अब तक सिलिकोसिस से 143 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 1500 से अधिक लोगो सिलिकोसिस की चपेट मे है.

इस गांव में हर घर को जानलेवा बीमारी (सिलिकोसिस) ने घेर रखा है. यहां युवाओं की 30 की उम्र में ही मौत हो जाती है. सिलिकोसिस को लेकर एक ओर चैकाने वाली बात सामने आई है कि सिलिकोसिस से सिरोही जिले के पिण्डवाडा क्षेत्र में पिछले 3 वर्षो में अब तक  सिलिकोसिस से143 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 1500 से अधिक लोगो सिलिकोसिस की चपेट मे है.

इस गांव की हालत यह है कि यहां केवल विधवा व छोटे-छोटे बच्चे हैं. वहीं यह गांव दो ग्राम पंचायत कोजरा व नांदिया के सीमा पर है। इसके कारण सार संभाल करने वाला कोई नहीं है. यहां ग्रामीणों ने बताया कि यहां उनकी सुध लेने वाला कोई भी नहीं है और न ही उनकों कोई सरकारी सहायता प्राप्त हुई है. ग्रामीणों ने बताया कि यहां विद्यालय नहीं होने के कारण करीब 6 किलोमीटर दूर नांदिया या शिवगढ़ स्कूल जाना पड़ता है.

गांव के युवा रोजगार ना होने और अशिक्षित होने के कारण पत्थर तराशने का काम करते हैं. जिससे निकलने वाले कण इन कारीगरों के फेंफड़ों में जमा हो जाते है और इससे इन लोगों को फेंफड़ों से संबंधित कई परेशानियां होने लगती हैं. जो लंबे समय तक रहने के कारण सिलिकोसिस में बदल जाती है.

क्या होता है सिलिकोसिस
सिलिका कणों और टूटे पत्थरों की धूल की वजह से सिलिकोसिस होती है. सिलिका कणों से युक्त धूल सांस के साथ फेफड़ों तक जाती है. ये कण फेफड़ों की दीवारों पर धीरे-धीरे जमकर एक मोटी परत बना लेते हैं. इससे फेफड़े ठीक से फैलना और सिकुड़ना बंद कर देते हैं. इससे सांस लेने में काफी तकलीफ होती है. धीरे-धीरे सांस लेने की पूरी प्रक्रिया को यह प्रभावित करता है और आखिरकार आदमी की मौत हो जाती है.

कहां होती है बीमारी की संभावना
यह बीमारी पत्थर के खनन, रेत-बालू के खनन, पत्थर तोड़ने के क्रेशर, कांच-उद्योग, मिट्टी के बर्तन बनाने के उद्योग, पत्थर को काटने और रगड़ने जैसे उद्योगों के मजदूरों में ज्यादा पाई जाती है. इसके साथ ही स्लेट-पेंसिल बनाने वाले उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों को भी सिलिकोसिस अपनी गिरफ्त में लेती है. जहां इस तरह के काम बड़े पैमाने पर होते हैं वहां काम करने वाले मजदूरों के अलावा आसपास के रहिवासियों के भी सिलिकोसिस से प्रभावित होने का खतरा होता है.

क्या कहते है डॉक्टर
डॉक्टरों के मतुाबिक यह एक लाइलाज बीमारी है, इसे रोकने का आज तक कोई कारगर तरीका इजाद नहीं किया जा सका है. डॉक्टरों का कहना है कि कई कंपनियों में मजदूरों को दिए जाने वाले मास्क भी परीक्षण के बाद बारीक कणों को सांस के द्वारा अंदर जाने से रोक पाने में सक्षम नहीं है. दरअसल यह सिलिका कण सांस के द्वारा पेफड़ों के अंदर तक तो पहुंच जाते हैं लेकिन बाहर नहीं निकल पाते.