लॉकडाउन का असर: देश में फ्यूल की मांग 46% हुई कम, 2007 के बाद सबसे कम खपत

 कोरोना महामारी से निपटने के चलते पिछले डेढ़ महीने से पूरा देश लॉकडाउन है. व्यापार से लेकर ट्रांसपोर्ट तक सबकुछ बंद है. ऐसे में पेट्रोल-डीजल की खपत कम होना लाजमी है. पिछले साल अप्रैल की तुलना में इस साल फ्यूल की खपत 45.8 फीसदी कम हुई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस साल अप्रैल में 9.93 मिलियन टन फ्यूल की खपत हुई है, जो साल 2007 के बाद सबसे कम है.

एक साल पहले की तुलना में पेट्रोल की बिक्री 60.6 फीसदी घटकर 0.97 मिलियन टन रही. वहीं डीजल की खपत 3.25 मिलियन टन हुई, जो पिछले साल की तुलना में 55.6 फीसदी कम है.

देश में स्टेट फ्यूल रिटेलर्स ने अप्रैल के पहले दो हफ्तों में पिछले साल की तुलना में 50 फीसदी कम फ्यूल बेचा. हालांकि रसोई गैस (एलपीजी) की बिक्री लगभग 12.1 फीसदी बढ़कर 2.13 मिलियन टन हुई. वहीं नेफ्था की बिक्री 9.5 फीसदी घटकर 0.86 मिलियन टन रह गई. राज्य-खुदरा विक्रेताओं ने अप्रैल के पहले हफ्ते में 21 फीसदी ज्यादा एलपीजी बेची. सरकार लॉकडाउन में मदद करने के लिए गरीबों को फ्री रसोई गैस सिलेंडर दे रही है.

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि देश की वार्षिक ईंधन खपत 2020 की में 5.6 प्रतिशत घट जाएगी. बता दें, देश में 25 मार्च से लॉकडाउन है. इस दौरान सरकारी या जरूरी सेवाओं से जुड़े लोगों को ही लॉकडाउन में छूट है. तीसरे चरण में लॉकडाउन 17 मई तक बढ़ा दिया गया है.

हाल ही में केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क यानी एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 13 रुपये प्रति लीटर बढ़ाया है. हालांकि एक राहत की बात है कि इस भार को ग्राहकों पर नहीं डाला गया है. तेल कंपनियां इस बोझ को वहन कर रही हैं. नहीं, सरकार ने ग्राहकों को राहत नहीं दी है बल्कि जो राहत मिल सकती थी उसे छीन लिया है. अगर सरकार इस एक्साइज ड्यूटी को नहीं बढ़ाती तो पेट्रोल-डीजल 10 रुपये से ज्यादा सस्ता मिल सकता था.