लॉकडाउन का पालन न करने वालों पर दर्ज FIR रद्द करने से SC का इंकार, याचिकाकर्ता की नीयत पर उठाया सवाल

लॉकडाउन के दौरान सरकारी आदेश का पालन न समेत दूसरे छोटे अपराध के लिए एफआईआर दर्ज न किए जाने की मांग सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. याचिका में कहा गया था कि ऐसी एफआईआर से पुलिस लोगों का दमन कर रही है. इससे आगे पुलिस और अदालतों के काम बढ़ेगा. याचिकाकर्ता ने पहले से दर्ज हो चुकी एफआईआर रद्द करने की भी मांग की थी.

सेंटर फॉर अकाउंटेबिलिटी एंड सिस्टेमेटिक चेंज (CASC) की तरफ से उसके अध्यक्ष विक्रम सिंह ने याचिका दाखिल की थी. विक्रम सिंह उत्तर प्रदेश के डीजीपी रह चुके हैं. उन्होंने कहा था कि सरकारी आदेश का पालन न करने पर लागू होने वाली आईपीसी को धारा 188 के सीमित इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट आदेश दे चुका है. राज्यों से कहा जाए कि डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत उन्होंने जो आदेश जारी किया है, किसी वजह से उसका पालन न कर पाने वालों पर धारा 188 का मुकदमा न थोपा जाए.

इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की, “अगर एफआईआर दर्ज नहीं होगी, तो लॉकडाउन का पालन कैसे सुनिश्चित होगा? हम पुलिस के हाथ बांधने वाला आदेश क्यों दें?” याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील गोपाल शंकरनारायण ने कहा, “याचिकाकर्ता सम्मानित पुलिस अधिकारी रह चुके हैं. वह जानते हैं कि ऐसे फिजूल के मुकदमों से भविष्य में पुलिस और अदालतों पर काम का बोझ पड़ेगा. देश भर में ऐसे 75 हजार से ज्यादा केस दर्ज हुए हैं.”

लेकिन जस्टिस अशोक भूषण, संजय किशन कॉल और बी आर गवई की बेंच इन दलों से आश्वस्त नहीं हुई. इस पर वकील ने कहा, “हमारे देश में कानून दो तरह से काम करता है. बड़े लोगों को चार्टर्ड फ्लाइट दी जा रही है. सड़क पर पैदल चल रहे गरीबों पर मुकदमे दर्ज हो रहे हैं.”

इस पर बेंच के सदस्य जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा, “हमें लग ही रह था कि याचिका में कुछ एजेंडा छुपा है. आखिर एक पुलिस अधिकारी यह कैसे कह सकता है कि पुलिस को कानून तोड़ने वालों के खिलाफ केस दर्ज करने से रोका जाए?” इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी.