जम्मू-कश्मीर पुनर्वास कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार से पुनर्वसन कानून में वंशज शब्द को परिभाषित और स्पष्ट करने के लिए कहा है.  कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता  की शिकायत  वंशज शब्द है क्योंकि याचिकाकर्ता ने अधिनियम के प्रावधान 4 (सी) को चुनौती दी है.जस्टिस एसके कौल ने सरकार से पूछा कि  कानून के तहत कितने आवेदन प्राप्त हुए.जम्मू-कश्मीर सरकार ने  बताया कि चूंकि इस पर रोक  है इसलिए अधिनियम अभी तक लागू नहीं किया गया है.जम्मू-कश्मीर सरकार के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि  जो लोग 1947 में कश्मीर छोड़ चुके थे, वे वंशज हो सकते हैं . यह उनका विचार है और वह सरकार से निर्देश लेंगे.  सुनवाई जनवरी में होगी।

दरअस, राज्य अधिनियम, 1982  जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों के राज्य में पुनर्वास या स्थाई वापसी के लिए परमिट देने के लिए है, जिनके   वंशज, एक मार्च, 1947 और 14 मई, 1954 के बीच पाकिस्तान चले गए थे. नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता अब्दुल रहीम रादर की ओर से 8 मार्च, 1980 को पेश किए गए जम्मू-कश्मीर पुनर्वास विधेयक को तत्कालीन एनसी सरकार द्वारा केंद्र की कांग्रेस सरकार को भेजा गया था.हालांकि, जम्मू-कश्मीर विधायिका के दोनों सदनों ने अप्रैल 19 82 में विधेयक पारित किया, फिर राज्यपाल बी के नेहरू ने इसे पुनर्विचार के लिए वापस कर दिया. जब विधेयक को दोनों सदनों द्वारा फिर से पारित किया गया था (जब फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे), राज्यपाल को अपनी सहमति देनी पड़ी.

हालांकि, फिर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने इसकी संवैधानिक वैधता के संबंध में अदालत की राय लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास राष्ट्रपति के संदर्भ के लिए यह कानून भेजा.मामला अदालत में  लगभग दो दशकों तक लंबित रहा. आखिरकार CJI एसपी  बरोचा के नेतृत्व में पांच सदस्यीय संवैधानिक खंडपीठ ने इसे 8 नवंबर, 2001 को बिना उत्तर दिए वापस  कर दिया. इसके बाद जम्मू की  पैंथर्स पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस कानून को चुनौती दी.