भारत में मौत का 7वां प्रमुख कारण है डायबिटीज, विश्वास न हो तो ये आंकड़े देख लीजिए

भारत एक ऐसी बीमारी की चपेट में है जो हमारी खुद की बनाई गई है. प्रदूषण की ही तरह डायबिटीज भी मैन मेड डिजास्टर है. भारत में दर्ज होने वाली मौत के कारणों में 1990 तक डायबिटीज शामिल नहीं था. हालांकि डायबिटीज के मरीज़ तो तब भी भारत में थे लेकिन 2019 आते आते यानी 29 सालों में डायबिटीज भारत में मौत का 7 वां कारण है. भारत में हर साल 10 लाख से ज्यादा लोग डायबिटीज के शिकार होकर मर रहे हैं. भारतीयों की कसरत ना करने की आदत उन्हें डायबिटीज का मरीज़ बना रही है.

हाल ही में आए एक सर्वे के नतीजे बता रहे हैं कि भारत में हर 12 में से एक व्यक्ति डायबिटीज का मरीज़ है. डायबिटीज हार्ट अटैक, किडनी फेल्यर और आंखों की रोशनी जाने की वजह बन सकती है. हालांकि ये ऐसी बीमारी है जिस पर दवा से ज्यादा लाइफस्टाइल और डायट में बदलाव का असर होता है.

12 में से हर एक भारतीय डायबिटीज का मरीज़ भारत में तकरीबन 8 करोड़ लोग डायबिटीज के शिकार इनमें से 20 फीसदी से भी कम की डायबिटीज कंट्रोल में है. भारत का हर शहर डायबिटीज की चपेट में. लगभग हर शहर में डायबिटीज काबू से बाहर. 2040 तक 13 करोड़ लोगों को हो सकती है डायबिटीज

अगर हालात ऐसे ही रहे तो भारत जल्द ही एक और ग्लोबल राजधानी बनने वाला है. और ये उपाधि होगी डायबिटीज की राजधानी की. डायबिटीज के मामले में चीन के बाद भारत दूसरे नंबर पर आता है. और आधे लोगों को तो ये पता भी नहीं है कि वो डायबिटीज के शिकार हैं. इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के 2017 के आंकलन के मुताबिक दुनिया भर में डायबिटीज के 7 करोड़ से ज्यादा मरीज़ हैं. 2034 तक दुनिया में 13 करोड़ से ज्यादा मरीज़ डायबिटीज के होंगे.

इंपैक्ट इंडिया स्टडी के तहत किया गया भारत के 19 शहरों का सर्वे बता रहा है कि भारतीयों की डायबिटीज काबू से बाहर है. भारतीयों का शुगर कंट्रोल यानी डायबिटीज चेक करने के लिए 2018 से 2019 के बीच 1 हज़ार लैब सेंटर का डाटा स्टडी किया गया.

जनवरी से जून 2018 के बीच 24 लाख मरीज़ों में से केवल 9 लाख ने डायबिटीज के लिए ज़रुरी एचबीए1सी टेस्ट करवाया था- इनमें से 3.5 लाख की डायबिटीज काबू से बाहर थी. इसी तरह जुलाई 2019 से सितंबर 2019 के बीच रजिस्टर हुए 18 लाख मरीज़ो में से केवल 4.25 लाख ने टेस्ट करवाए इनमें से 1.66 लाख मरीज़ों की डायबिटीज काबू से बाहर थी.

2018 से 2019 के बीच 5 बार डाटा इकट्ठा करके 19 शहरों का जो औसत आया उसके मुताबिक चंडीगढ़ को छोड़कर बाकी 18 शहरों में डायबिटीज का औसत 8 से उपर था. इस स्टडी में ये आंकलन भी किया गया कि अगर कोई व्यक्ति अपने डायबिटीज के लेवल में एक प्रतिशत की कमी ले आए तो वो बीमारियों के खतरे को कम कर सकता है. एचबीए1सी के लेवल में एक प्रतिशत की कमी से – यानी डायबिटीज कंट्रोल करके

Stroke यानी लकवे का खतरा 12 फीसदी कम किया जा सकता है. हार्ट अटैक का खतरा 14 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है. किडनी की बीमारी का खतरा 33 फीसदी कम हो सकता है और शुगर की वजह से अंग कटने का खतरा 43 प्रतिशत तक कम हो सकता है.

एचबीए1सी का स्तर 5 से कम होने पर व्यक्ति स्वस्थ माना जाता है. ये एक ब्लड टेस्ट है जो शरीर में शुगर का तीन महीने का औसत स्तर बताता है. लेकिन ये मैप बता रहा है कि भारत के हर शहर में ये बीमारी कंट्रोल से बाहर है. लेकिन डायबिटीज के आधे से ज्यादा मरीज़ अपने टेस्ट नहीं करवाते, जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इंसुलिन पर निर्भर डायबिटीज के मरीज़ों को साल में 4 बार और डायबिटीज के दूसरे मरीज़ों के लिए साल में कम से कम दो बार टेस्ट करवाना ज़रुरी है. घर पर शुगर यानी डायबिटीज का टेस्ट मानिटरिंग के लिए अहम है लेकिन ब्लड टेस्ट करवाकर आप अपने शरीर में ब्लड ग्लूकोज़ का तीन महीने का औसत स्तर जान सकते हैं.