रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शुक्रवार को करेंगे लेह-लद्दाख का दौरा, थलसेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे भी होंगे शामिल

सीमा पर चीन से चल रहे टकराव के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शुक्रवार को लेह-लद्दाख के दौरे पर पहुंचेंगे. रक्षा मंत्री के साथ थलसेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे भी लेह आएंगे. सूत्रों के मुताबिक, लेह पहुंचने पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सीधे सेना की 14वी कोर (‘फायर एंड फ्यूरी’) के मुख्यालय पहुंचेंगे. वहां लेह कोर के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह पूर्वी लद्दाख से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन से चल रही तनातनी के बारे में एक प्रेजंटेशन के जरिए पूरी जानकारी देंगे. साथ ही 30 जून को चीनी सैन्य कमांडर से हुई बैठक में डिसइंगेजमेंट और डी-एस्कलेशन के लिए बनी सहमति के बारे में भी पूरी जानकारी देंगे.

माना जा रहा है कि रक्षा मंत्री लेह दौरे के दौरान सीमा पर तैनात सैनिकों से मुलाकात करेंगे. इनमें वे सैनिक भी मौजूद होंगे जो गलवान घाटी में चीनी सेना से लड़ते हुए घायल हो गए थे.

इस बीच खबर है कि चीनी विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को कोर कमांडर स्तर की मीटिंग में चरणबद्ध तरीके से डिसइंगेजमेंट और डी-एस्कलेशन पर बनी सहमति का स्वागत किया है. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इससे भारत-चीन सीमा पर स्थिति सुधरेगा और सैनिकों के बीच तनातनी (‘तापमान’) भी कम होगा.

आपको बता दें कि मंगलवार को हुई बैठक में दोनों देशों की सेनाएं सैनिकों को विवादित इलाके से पीछे करने और सैनिकों की संख्या कम करने पर राजी हो गए हैं. लेकिन ये डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया एक बेहद जटिल और लंबी प्रक्रिया है और इसके लिए अभी सैन्य और राजनयिक स्तर पर अभी और मीटिंग की जरूरत है.

मंगलवार की मीटिंग में दोनों देश के कमांडर इस बात पर राजी हो गए हैं कि किसी विवादित क्षेत्र में डिसइंगेजमेंट यानि सैनिकों को पीछे हटने के करीब 72 घंटे तक दोनों देश की सेनाएं एक दूसरी के पीछे हटने की मूवमेंट पर नजर रखी जाएगी. अगर ये चरण सफल रहा तो तभी दूसरे विवादित क्षेत्र पर डिसइंगेजमेंट प्रक्रियआ शुरू होगी. ऐसे में पूर्वी लद्दाख से सटी पूरी 856 किलोमीटर लंबी एलएसी यानि लाइन ऑफ एक्चुयल कंट्रोल पर डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया एक लंबा वक्त ले सकता है. हालांकि, इस एलएसी पर फिंगर-एरिया, गलवान घाटी (पैट्रोलिंग पॉइंट नंबर ,14, 15 और 17) , डेपसांग प्लेन्स और गोगरा जैसे कुल सात मुख्य विवादित इलाके हैं जहां पहले डी-एसक्लेशन यानि सैनिकों की तादाद कम करने पर जोर दिया जाएगा.