इस समुद्री जीव पर मंडरा रहा बड़ा संकट, अब जापान भी शुरू करेगा इसका शिकार

देश में कई प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर हैं। इसमें समुद्री जीव भी शामिल हैं। समुद्री जीवों के अस्तित्व पर खतरे की बात अब तक प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या ही बताई जाती रही है। जिसकी कई भयावह तस्वीरें भी सामने आईं। जिसमें अधिक प्लास्टिक के कारण व्हेल जैसे जलीय जीवों की मौत हो गई। इन जीवों के पेट से भारी मात्रा में प्लास्टिक भी निकला। लेकिन आपको क्या लगता है कि व्हेल के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा केवल प्लास्टिक प्रदूषण ही है?

हाल ही में इंडोनेशिया के वटोबी नेशनल पार्क में 9.5 मीटर लंबी व्हेल का शव मिला। पार्क के प्रमुख हैरी सैंटोसो ने कहा कि वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन ग्रुप के रिसर्चर और पार्क की  कंजर्वेशन एकेडमी को व्हेल के पेट से 5.9 किलो (13 पाउंड) प्लास्टिक का कचरा मिला है। इस कचरे में 115 प्लास्टिक के कप, चार प्लास्टिक की बोतल, 25 प्लास्टिक के बैग, 2 फ्लिप फ्लॉप, एक नायलॉन का थैला और करीब एक हजार प्लास्टिक के अन्य टुकड़े मिले हैं।

अगर आप सोच रहे हैं कि यही एक समस्या है, तो ऐसा नहीं है। एक और समस्या है, और वह है इनका शिकार किया जाना। एक समय ऐसा था जब व्हेल की संख्या 2 लाख से भी अधिक थी। वहीं आज ऐसा समय आ गया है जब इनकी संख्या 25 हजार के करीब ही रह गई है। शिकार और व्यवसाय के लिए इनको मौत के घाट उतारने के पीछे जापान जैसे देशों का बहुत बड़ा हाथ है।

आईडब्लूसी से हटने की घोषणा

जापान ने हाल ही में इंटरनेशनल व्हेलिंग कमीशन (आईडब्लूसी) से हटने की घेषणा कर दी है। जापान का कहना है कि वह जुलाई 2019 से व्हेल के व्यवसायिक शिकार की फिर से शुरुआत करेगा। जापान के इस कदम की वैश्विक तौर पर जमकर आलोचना की जा रही है। व्हेल की कम होती संख्या से जापान पूरी तरह अवगत है लेकिन बावजूद इसके वह कहता है कि वह अपनी समुद्री सीमा और विशेष आर्थिक क्षेत्र में व्हेल के शिकार की फिर से शुरुआत करेगा।

1986 में लगाया था प्रतिबंध

आईडब्लूसी में जापान 1951 में सदस्य बना। प्रजातियों के विलुप्त होने की कगार पर इस कमिशन ने व्हेल के व्यवसायिक शिकार पर साल 1986 में प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन बावजूद इसके जापान ने वैज्ञानिक शोध का बहाना लेते हुए कई सालों तक व्हेल का शिकार किया। उसकी इस वजह से कई बार निंदा भी की गई। उसने प्रोटीन के अलावा और भी कई उद्देश्य को पूरा करने के लिए व्हेल का प्रयोग किया। वह प्राचीन समय से ही ऐसा करता आ रहा है। जापान ने सदस्यता छोड़ने का कदम इसलिए उठाया क्योंकि उसे आईडब्ल्यूसी से व्यावसायिक व्हेलिंग के लिए इजाजत नहीं मिल पाई।

शिकार के बाद तेजी से घटने लगी संख्या
व्हेल के शिकार जैसी गतिविधियां बढ़ने के बाद इनकी संख्या में तेजी से कमी आई है। इनके शिकार से पहले ये संख्या करीब 2,2,331 थी। सबसे बड़ी यह संख्या अंटार्कटिक में थी। इसके अलावा पूर्वी उत्तरी प्रशांत, अंटार्कटिक, और हिंद महासागर में व्हेल की संख्या 2 हजार के करीब थी।

हैरान करने वाले आंकड़े आए सामने

साल 2002 में व्हेल को लेकर हैरान करने वाले आंकड़े सामने आए। इन आंकड़ों में कहा गया कि दुनियाभर में व्हेल की संख्या अब 5-12 हजार ही रह गई है। वहीं आईयूसीएन का मानना है कि ये संख्या 10-25 हजार के बीच है। साल 2014 में कैलिफोर्निया की नीली व्हेल वाली आबादी भी तेजी से घट गई।

व्हेल का मांस

जापान का कहना है कि व्हेल का मांस खाना लंबे समय से उनकी संस्कृति का हिस्सा रहा है। साथ ही वह वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए भी व्हेल के शिकार को जरूरी मानता है। इसी कारण से जापान की संरक्षणवादियों द्वारा आलोचना की जा रही है। वहीं जापान का कहना है कि व्हेल की संख्या अब बढ़ गई है और उसका व्यावसायिक शिकार अब किया जाना चाहिए। जबकि आईयूसीएन इन बातों से इनकार करता रहा है।

इतनी व्हेल एक साल में मार चुका है जापान

जापान ने कुछ समय पहले एक विवादित व्हेल शिकार अभियान चलाया था। इस अभियान के तहत उसने मिंक प्रजाति की 122 गर्भवती व्हेल को मारा था। जापान ने ये अभियान अंटार्कटिक महासागर में चलाया। जो करीब 4 माह तक चला। इस अभियान की समाप्ति गत मार्च में ही हुई है। जापान ने अभियान से संबंधित एक रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय व्हेलिंग समिति को सौंपी और कहा कि उसने इस दौरान करीब 333 मिंक व्हेल का शिकार किया है।

वहीं खुद के बचाव में उसने कहा कि ये सब वैज्ञानिक शोध के लिए किया गया है। इस मामले पर ऑस्ट्रेलिया ने भी जापान से अपील की लेकिन उसने मानने से इनकार कर दिया। जापान में प्रोटीन की कमी को दूर करने के लिए रात के खाने में व्हेल का मीट खाया जाता है। अब प्रतिबंध हटने से ऐसे लोगों की संख्या में इजाफा हो सकता है।